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Monday, October 8, 2012

skeleton with a copper locket containing a woman’s hair around its neck




वो दीद बेखबर हो गयी | मुझे देखकर खो गयी |
आप आयेंगे ये वादे पे, बैठे बैठे सहर हो गयी |
मेरा वजूद कहां खो गया | जिंदगी रहगुज़र हो गयी |
आपसे प्यार करना था, आपसे ही जबर हो गयी |
वक़्त रुकता कहां है, इक घडी, इक सफ़र हो गयी |
दिल को अब फुर्सत कहां, महज ये नजर रो गयी |

(लोगों के पास अब पढने का टाइम नहीं है , और अपना हाल कुछ यों है कि जब सोचता हूँ तो लिखता नहीं , और अब लिखता हूँ तो सोच नहीं पाता । क्षमा करना भाई लोग,जो भी है जैसा भी है, पढ़ें तो गाली न दें । इसलिए कुछ फुटकर ही लिखता रहूँगा ।)

Saturday, January 14, 2012

फीके पन्नों से.... ५

वक़्त रेत की मानिंद बिखरता रहा,
    मैं बैठा हुआ जिंदगी के टीले पे |
      फलक पे छायी थी सूरज की लालिमा ,
  शाम का स्याह अँधेरा ,
      मुझे अपनी जद में लेने को बेताब |


Friday, July 8, 2011

फीके पन्नों से ...४

इश्क, जिंदगी में अज़ब सिलसिला रहा |
हादसों में हम न रहे, तजरुबा रहा |


[Heartbroken by Mel ]

Saturday, May 14, 2011

फीके पन्नों से ... ३

वक़्त कब परछाई बन कर गायब हो जाता है, पता ही नहीं चलता | कभी हम जैसा होता है, फिर हमसाया बन जाता है | रौशनी के ठीक नीचे हमें पता ही नहीं चलता कि हमारा साया हमारे साथ खड़ा है | हम चुपचाप चल देते हैं | वो साया भी नज़र आने लगता है | अब वो हमारे साथ ही है, पर पल पल चलते रहने से वो भी चलता जाता है | और अचानक ख़त्म हो जाता है | हर गली पर ये रौशनी थोड़ी देर के लिए एक साया देती हैं, मानों हमारे अकेलेपन के लिए एक साथी दे रही हो | कुछ देर साथ चलकर वो साया ख़त्म हो जाता है, हमें किसी और साये का साथ देकर | एक के बाद एक अँधेरा, एक के बाद एक साया | जिंदगी शायद इसी रास्ते का नाम है | वो साये, हर एक पल के अहसास होते हैं | जितनी तेज़ हमारी चाल होती है, वो साये हर वक़्त हमसे तेज़ होते हैं, वक़्त के जैसे | 


[Image Courtesy :Antonio Bassi]

Monday, April 18, 2011

फीके पन्नों से ...२


जब से आईने को तवज्जो दी है ,
अपना अक्स धुंधलाया लगता है |


[le miroir by isabelle garnier]

Saturday, April 9, 2011

फीके पन्नों से ...

मेरी आँखों में अपना अक्स देख के वो मुस्कुराई, 
बोली - "इतना प्यार करते हो मुझसे ?" 
मैं शर्मिंदा हुआ, 
कैसे समझाता, 
"ये आईने हैं |"



[Statue in the Garden by Jean Gordon]

Wednesday, November 3, 2010

काँव-काँव त्रिवेणी

यार जिदंगी भर कहानियाँ ही लिखता रहा तो मैं ही कहानी बन जाऊँगा |  वो वादा ही क्या जिसे तोडा ना जाए | वैसे तो ये भी मैं त्रिवेणी स्टाइल में लिख सकता था| बहरहाल ... गुलज़ार का ही आविष्कार है शायद त्रिवेनियाँ , अगर नहीं तो माफ़ करना क्योंकि हिंदी व्याकरण का मेरा ज्ञान थोडा कम है | अमीर खुसरो के बाद किसी को है भी कहाँ | त्रिवेणी का गहन और गुप्त (गुप्त इसलिए क्यूंकि ऑफिस में किया ) अध्ययन करने के उपरांत मैं ये बात समझा हूँ कि दो पंक्तियों का तीसरी पंक्ति से रिश्ता नहीं होते हुए भी होता है | कोई और परिभाषा है तो मुझे मत बताना, आजकल संज्ञा सर्वनाम पे भी गाली मारते हैं लोग | तो कुछ त्रिवेनियाँ लिखने की कोशिश की हैं | पहले ही कह देता हूँ , कथाकार की तड़ी में रहता हूँ , इसलिए भाव से अधिक विषय प्रधान होगा | 

- मेरे सीने में लगी है दुश्मन की एक गोली,
ये गिरा मैं इधर, जय हिंद कहते हुए,

बच्चों के साथ तुम भी बच्चे बन जाते हो |



- गिरा, फिर उठा, फिर से गिर गया,
आसमान को देख के फिर से हौसला लाया है ,

फिर भी बंटू रेस में सबसे आखिरी में आया है |



-आओ मंदिर मस्जिद खेलें, कुरआन-गीता बांचे हम,
आओ होली-ईद मनाएं , खुशियों के दिए जलाएं,

मगर आज सुबह से  बाज़ार में कर्फ्यू लगा है |



-क्या दिया पापा ने हमें , बस छोड़ गए रंजिशें, 
उनके जाने के बाद भी हम झगड़ते रहे जमीन को लेकर,

बापू की तस्वीर पे नया फ्रेम लगाना था यार |



-बात नहीं की पूरे दिन, जाने कहाँ गायब रहा .
सुबह सुबह सूरज ने मारा था उसे ,

चाँद ने रो रो के शबनम गिराए रात भर |




-कुछ सोचता ही नहीं , कुछ देखता भी नहीं.
फिर भी हर रोज़ एक नयी पोस्ट लिखता हूँ.

कीबोर्ड भी अजीब ज़ज्बाती होता है |




-आज फिर गलत इन्फोर्म किया उसने आशिक को , 
वो बेचारा दिन भर माशूक का वेट करता रहा ,


नया कव्वा है, नहीं जानता किस मुंडेर पे काँव-काँव करनी है |