Saturday, April 9, 2011

फीके पन्नों से ...

मेरी आँखों में अपना अक्स देख के वो मुस्कुराई, 
बोली - "इतना प्यार करते हो मुझसे ?" 
मैं शर्मिंदा हुआ, 
कैसे समझाता, 
"ये आईने हैं |"



[Statue in the Garden by Jean Gordon]

10 comments:

  1. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (11-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  2. बहुत खूबसूरत एहसास |
    और उतनी ही सुंदर रचना .

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  3. kah sabdo me bhut kuch chupa hai... bhut hi sunder...

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  4. देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर .....
    इससे उपयुक्त टिप्पड़ी आपकी कविता के लिए नही मिली मुझे नीरज जी ..चार पंक्तियों में ही सारा कुछ कह गए आप अच्छा लगा आता रहूँगा आगे भी !

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  5. Achha laga aapke yahan aa kar neeraj.

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  6. बहुत सुंदर रचना ....

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